
साठ के दशक में जब आज़ादी के दौर में देखे गए सपने थकने से लगे थे और आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी विदा हो चुकी थी और उसकी कमाई खाने वाले लोग हर तरफ़ उभर रहे थे । ऐसे समय में जब चीन युद्ध के बाद की हताशा और नेहरू के निधन से पैदा शून्य के बीच भारतीय राजनीति ख़ुद को पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित करने की चुनौती से गुज़र रही थी.... तब देश को जार्ज फर्नाडिस के रूप में एक जुझारू एवं विद्रोही चेहरा मिला ।
इस दौर में एक तरफ़ लोहिया और गांव-देहात और पिछड़ों से जुड़ी उनकी समाजवादी चिंताएं थीं और दूसरी तरफ़ उभरता हुआ जनसंघ था जो तब भी कभी अखंड भारत का जाप करता था और कभी हिंदी-हिंदू, हिंदुस्तान का नारा लगाता था. इस नए सिरे से संघर्षरत भारत में जो कुछ चमकते चेहरे भविष्य के प्रति आस्था जगाते थे, उनमें जॉर्ज फर्नांडिस भी एक थे।
जार्ज फर्नाडिस जैसे किसी धूमकेतु की तरह उदित हुए थे । शुरुआत उन्होंने मज़दूर आंदोलन से की थी । वे मुंबई की टैक्सी यूनियन के नेता थे और तब उनके एक इशारे पर महानगर का चक्का जाम हो जाया करता था । 1967 में उन्होंने महाराष्ट्र के महारथी एसके पाटिल को हरा कर लोकसभा में प्रवेश किया था।
लेकिन वे हारे और जॉर्ज किसी सनसनी की तरह सामने आए. सत्तर के दशक में इस सनसनी ने बताया कि वह दीर्घजीवी ज्वालामुखी हैं. इमरजेंसी से पहले 15 लाख रेलकर्मियों को लेकर उन्होंने जिस तरह हड़ताल की थी, उसे मजदूर आंदोलन के इतिहास में किसी मिथक कथा की तरह याद रखा जाता है. इसी तरह इमरजेंसी के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने मुजफ्फरपुर सीट से जिस तरह जीत हासिल की, वह भी राजनीति की बार-बार दुहराई जाने वाली कहानियों में है. उस दौर के नेताओं में अटल के अलावा वे दूसरे थे जिनकी वक्तृता शैली की अलग से चर्चा होती थी।

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